सीधा जवाब: पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ है, जो भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सुझाव पर अभिनेता नज़ीर हुसैन ने लिखी और कुंदन कुमार ने निर्देशित की।
क़रीब ₹5 लाख में बनी इस फ़िल्म ने ₹75–80 लाख का कारोबार किया। रिलीज़ की तारीख़ पर स्रोत एकमत नहीं — ज़्यादातर 1963 बताते हैं, विकिपीडिया का फ़िल्म पेज 1962।
आज भोजपुरी सिनेमा हर साल सौ से ज़्यादा फ़िल्में बनाने वाली इंडस्ट्री है, और पवन सिंह, खेसारी लाल यादव और निरहुआ जैसे सितारे बिहार-उत्तर प्रदेश से लेकर मॉरीशस तक पहचाने जाते हैं। लेकिन पहली भोजपुरी फ़िल्म किसी फ़िल्म कंपनी के कारोबारी फ़ैसले से नहीं बनी थी। उसकी शुरुआत देश के राष्ट्रपति की एक इच्छा से हुई थी — और उसे देखने लोग बैलगाड़ियों में भरकर सिनेमाघर पहुँचे थे।
इस पेज में उस फ़िल्म की पूरी कहानी है: किसने बनवाई, किसने बनाई, किसने गाया, कितना ख़र्च हुआ और कितनी कमाई हुई — और उसके बाद 60 सालों में भोजपुरी सिनेमा कैसे गिरा, उठा और फिर बड़ा हुआ।
पहली भोजपुरी फ़िल्म: एक नज़र में
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| फ़िल्म | गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो |
| प्रेरणा | डॉ. राजेंद्र प्रसाद (भारत के पहले राष्ट्रपति) |
| निर्देशक | कुंदन कुमार |
| निर्माता | विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी और जय नारायण लाल (निर्मल पिक्चर्स) |
| कहानी और पटकथा | नज़ीर हुसैन — आचार्य शिवपूजन सहाय की एक कहानी पर आधारित |
| संगीत / गीत | चित्रगुप्त / शैलेंद्र |
| गायक | लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, उषा मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर |
| मुख्य कलाकार | कुमकुम, असीम कुमार, नज़ीर हुसैन, हेलेन, पद्मा खन्ना, सुजीत कुमार, लीला मिश्रा, रामायण तिवारी |
| बजट | शुरुआत ₹1.5 लाख, अंत में क़रीब ₹5 लाख |
| कारोबार | ₹75 लाख (विकिपीडिया) / ₹80 लाख (इंडिया न्यूज़) |
| रिलीज़ | 1963 (ज़्यादातर स्रोत) — तारीख़ पर मतभेद नीचे देखें |
राष्ट्रपति की इच्छा से शुरू हुई कहानी
विकिपीडिया के भोजपुरी सिनेमा वाले लेख और प्रभात ख़बर, दोनों के मुताबिक़ डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बॉलीवुड अभिनेता नज़ीर हुसैन से मुलाक़ात में भोजपुरी भाषा में फ़िल्म बनाने को कहा था। उस दौर में हिंदी सिनेमा पूर्वांचल की संस्कृति और बोली को पर्दे पर लगभग जगह नहीं देता था — यही कमी इस फ़िल्म की असली वजह बनी।
नज़ीर हुसैन इस काम के लिए स्वाभाविक पसंद थे। इंडिया न्यूज़ के अनुसार वे उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा से सटे ग़ाज़ीपुर के रहने वाले थे और बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार माने जाते थे। उन्होंने फ़िल्म की कहानी और पटकथा लिखी, जो हिंदी साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय की एक कहानी पर आधारित थी, और फ़िल्म में अभिनय भी किया।
पैसा लगाया विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी ने। इंडिया न्यूज़ के मुताबिक़ वे कोयले के कारोबारी थे और ख़ुद एक सिनेमाघर के मालिक भी। उनके साथ जय नारायण लाल सह-निर्माता थे।
मुंबई की पूरी टीम, भोजपुरी की कहानी
यह फ़िल्म भले पहली भोजपुरी फ़िल्म थी, लेकिन इसके पीछे की टीम हिंदी सिनेमा की पहली कतार से थी। संगीत चित्रगुप्त का था और गीत शैलेंद्र ने लिखे। विकिपीडिया के अनुसार फ़िल्म के सात गानों को लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर ने आवाज़ दी। (प्रभात ख़बर गायकों में आशा भोसले का नाम भी लेता है, जो बाक़ी स्रोतों में नहीं है।)
कलाकारों में कुमकुम और असीम कुमार मुख्य जोड़ी थे, और साथ में हेलेन, पद्मा खन्ना, सुजीत कुमार और लीला मिश्रा जैसे जाने-पहचाने चेहरे थे। यानी पहली भोजपुरी फ़िल्म एक छोटी क्षेत्रीय कोशिश नहीं, बल्कि मुंबई के संसाधनों से बनी पूरी तरह पेशेवर फ़िल्म थी।
फ़िल्म की कहानी क्या थी
कहानी एक अमीर लड़के और ग़रीब लड़की के प्रेम की है, जिनकी शादी के बीच वर्ग की दीवार खड़ी है। लड़की की ज़बरदस्ती एक बुज़ुर्ग से शादी करा दी जाती है, जिसकी मौत के बाद वह विधवा होकर अपमान और अत्याचार झेलती है। आख़िर में दोनों प्रेमी फिर मिलते हैं और शादी करते हैं। यानी पहली ही भोजपुरी फ़िल्म ने सिर्फ़ प्रेम कहानी नहीं कही — उसके केंद्र में विधवा के साथ समाज का बर्ताव था, जो उस दौर में गाँव-क़स्बों के दर्शकों का अपना सवाल था।
बैलगाड़ियों में भरकर पहुँचे दर्शक, हॉल में जूते उतारे
फ़िल्म की रिलीज़ से पहले पटना के सदाक़त आश्रम में एक विशेष स्क्रीनिंग रखी गई, जिसमें ख़ुद डॉ. राजेंद्र प्रसाद शामिल हुए। इसके बाद फ़िल्म जब सिनेमाघरों में आई, तो उसका असर किसी त्योहार जैसा था।
प्रभात ख़बर के मुताबिक़ लोग बैलगाड़ियों में भरकर सिनेमाघर पहुँचते थे। इंडिया न्यूज़ एक और दिलचस्प बात बताता है: फ़िल्म का नाम गंगा मैया से जुड़ा धार्मिक नाम था, इसलिए कई दर्शक चप्पल-जूते उतारकर थिएटर के अंदर जाते थे।
कारोबार के आँकड़े इस भीड़ की पुष्टि करते हैं। फ़िल्म का बजट शुरू में ₹1.5 लाख रखा गया था, जो बढ़ते-बढ़ते क़रीब ₹5 लाख पहुँचा। कमाई विकिपीडिया के अनुसार ₹75 लाख और इंडिया न्यूज़ के अनुसार ₹80 लाख रही — यानी लागत का 15 गुना या उससे ज़्यादा।
रिलीज़ कब हुई? चार स्रोत, तीन जवाब
“पहली भोजपुरी फ़िल्म कब आई” — इस सवाल पर इंटरनेट पर अलग-अलग तारीख़ें मिलती हैं। किसी एक को चुपचाप सही मान लेने के बजाय, यहाँ सभी दावे साथ रखे गए हैं:
| स्रोत | रिलीज़ की तारीख़ | जगह |
|---|---|---|
| विकिपीडिया (फ़िल्म का पेज) | 5 फ़रवरी 1962 | प्रकाश टॉकीज़, बनारस |
| विकिपीडिया (भोजपुरी सिनेमा लेख) | 1963 | — |
| इंडिया न्यूज़ | 22 फ़रवरी 1963 | पटना |
| प्रभात ख़बर | 23 फ़रवरी 1963 | — |
इन दावों को जोड़ने का एक संभावित तरीक़ा यह है कि अलग-अलग शहरों में फ़िल्म अलग-अलग समय पर लगी हो — उस दौर में प्रिंट एक शहर से दूसरे शहर जाते थे, और पहले प्रदर्शन व बिहार की रिलीज़ में फ़र्क़ होना असामान्य नहीं था। लेकिन इसका कोई दस्तावेज़ी सबूत हमारे पास नहीं है। सुरक्षित जवाब यही है: ज़्यादातर स्रोत 1963 मानते हैं, फ़रवरी का महीना सभी में समान है।
एक और मतभेद: प्रभात ख़बर निर्देशक के तौर पर दामोदर दत्त का नाम लेता है, जबकि विकिपीडिया के दोनों पेज निर्देशक कुंदन कुमार को बताते हैं। कुंदन कुमार ने बाद में 1965 की भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा’ भी बनाई, इसलिए इस पेज पर उन्हीं का नाम रखा गया है।
पहली फ़िल्म के बाद: भोजपुरी सिनेमा के 60 साल
‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ की सफलता ने तुरंत एक लहर पैदा की, लेकिन यह सफ़र सीधा नहीं रहा। विकिपीडिया के भोजपुरी सिनेमा लेख के आधार पर मोटा ख़ाका:
| दौर | क्या हुआ |
|---|---|
| 1962–1967 | पहली लहर — 19 फ़िल्में बनीं; एस.एन. त्रिपाठी की ‘बिदेसिया’ (1963) और कुंदन कुमार की ‘गंगा’ (1965) सफल रहीं |
| 1967–1976 | गिरावट — पूरे दशक में सिर्फ़ दो फ़िल्में आईं |
| 1977 | ‘दंगल’ — पहली रंगीन भोजपुरी फ़िल्म |
| 1977–2001 | धीमी वापसी — क़रीब 150 फ़िल्में, यानी औसतन छह फ़िल्में सालाना; 1982 की ‘नदिया के पार’ (अवधी-भोजपुरी) बड़ी हिट |
| 2001 | मोहन प्रसाद की ‘सैयां हमार’ सिल्वर जुबली हिट, जिसने रवि किशन को स्टार बनाया |
| 2000 का दशक | मनोज तिवारी की ‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ जैसी कम बजट फ़िल्मों ने लागत का दस गुना से ज़्यादा कमाया; 2008 तक सालाना 100 से ज़्यादा फ़िल्में |
| 2008 | मिथुन चक्रवर्ती की ‘भोले शंकर’ — उस समय की सबसे महँगी भोजपुरी फ़िल्म |
| 2022 | 186 फ़ीचर फ़िल्में सिनेमाघरों के लिए बनीं |
राष्ट्रीय स्तर पर भी भोजपुरी सिनेमा ने पहचान पाई — ‘कब होई गवना हमार’ और सिद्धार्थ सिन्हा की लघु फ़िल्म ‘उधेड़ बुन’ को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले, और ‘उधेड़ बुन’ का वर्ल्ड प्रीमियर बर्लिन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में हुआ।
आज के सितारों की कहानी इसी सिलसिले की अगली कड़ी है — निरहुआ, खेसारी लाल यादव और पवन सिंह के पूरे सफ़र हमने अलग पेजों पर लिखे हैं।
आज क्यों ज़रूरी है यह इतिहास
भोजपुरी फ़िल्मों पर आज अक्सर अश्लीलता और डबल-मीनिंग गानों का आरोप लगता है — यह बहस हाल में भी हुई, जब मोनालिसा ने कहा कि आरोप लगाने वालों ने भोजपुरी फ़िल्में देखी ही नहीं। उस बहस में पहली भोजपुरी फ़िल्म एक दिलचस्प संदर्भ है: एक राष्ट्रपति की पहल पर बनी, साहित्यिक कहानी पर आधारित, विधवा के सम्मान जैसे सामाजिक सवाल उठाने वाली और लता-रफ़ी की आवाज़ों वाली फ़िल्म। इंडस्ट्री की शुरुआत गंभीर सिनेमा से हुई थी — बाद का बाज़ार किस तरफ़ गया, यह अलग कहानी है।
इस फ़िल्म की विरासत अब भी ज़िंदा है। विकिपीडिया के मुताबिक़ 1965 में हुए पहले भोजपुरी फ़िल्म पुरस्कारों में इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री समेत कई सम्मान मिले, और 2011 में बिहार दिवस समारोह में इसे फिर से दिखाया गया। पुरानी और नई भोजपुरी फ़िल्में आज कहाँ देखी जा सकती हैं, इसके लिए हमारी भोजपुरी फ़िल्में कहाँ देखें गाइड देखें, और भोजपुरी की बाक़ी ख़बरें भोजपुरी सेक्शन में।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पहली भोजपुरी फ़िल्म कौन सी है?
पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ है। इसे कुंदन कुमार ने निर्देशित किया, विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी ने बनाया और नज़ीर हुसैन ने लिखा।
पहली भोजपुरी फ़िल्म कब रिलीज़ हुई?
ज़्यादातर स्रोत फ़रवरी 1963 बताते हैं (इंडिया न्यूज़ 22 फ़रवरी, प्रभात ख़बर 23 फ़रवरी)। विकिपीडिया का फ़िल्म वाला पेज 5 फ़रवरी 1962 को बनारस में रिलीज़ बताता है।
पहली भोजपुरी फ़िल्म बनाने का सुझाव किसने दिया था?
भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अभिनेता नज़ीर हुसैन से भोजपुरी में फ़िल्म बनाने को कहा था। रिलीज़ से पहले पटना के सदाक़त आश्रम में हुई विशेष स्क्रीनिंग में वे ख़ुद मौजूद थे।
‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ ने कितनी कमाई की?
क़रीब ₹5 लाख की लागत वाली इस फ़िल्म ने विकिपीडिया के अनुसार ₹75 लाख और इंडिया न्यूज़ के अनुसार ₹80 लाख का कारोबार किया।
पहली भोजपुरी फ़िल्म में किसने गाने गाए?
गाने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, उषा मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर ने गाए। संगीत चित्रगुप्त का और गीत शैलेंद्र के थे।
पहली रंगीन भोजपुरी फ़िल्म कौन सी है?
1977 में आई ‘दंगल’ को पहली रंगीन भोजपुरी फ़िल्म माना जाता है।
स्रोत: विकिपीडिया — Ganga Maiyya Tohe Piyari Chadhaibo, विकिपीडिया — Bhojpuri cinema, प्रभात ख़बर, इंडिया न्यूज़।












