भारतीय सिनेमा के सबसे प्रयोगधर्मी निर्देशकों में गिने जाने वाले सिंगीतम श्रीनिवास राव अब नहीं रहे। यह वह फ़िल्मकार थे जिन्होंने 1987 में एक पूरी फ़िल्म बिना एक भी संवाद के बना दी, जिन्होंने कमल हासन को परदे पर बौना बनाकर दिखाया जब न आज जैसे विज़ुअल इफ़ेक्ट्स थे न कंप्यूटर, और जो तेलुगु सिनेमा में टाइम ट्रैवल की कहानी लेकर आए। सबसे ख़ास बात यह कि वह आख़िर तक काम करते रहे — उनकी आख़िरी फ़िल्म इसी साल रिलीज़ हुई।
नीचे वह सब है जो उनके बारे में जानना ज़रूरी है — वह कौन थे, उनकी सबसे बड़ी फ़िल्में कौन-सी हैं, हिंदी दर्शकों से उनका क्या रिश्ता रहा और सिनेमा जगत ने उन्हें कैसे याद किया।
सिंगीतम श्रीनिवास राव का निधन — क्या हुआ
तेलंगाना टुडे के मुताबिक़ सिंगीतम श्रीनिवास राव ने शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 को चेन्नई के कावेरी अस्पताल में आख़िरी सांस ली। वह कुछ समय से उम्र से जुड़ी बीमारियों के चलते अस्पताल में भर्ती थे। India TV, Pinkvilla और Deccan Chronicle समेत तमाम रिपोर्ट्स में उनकी उम्र 94 साल बताई गई है। (विकिपीडिया पर उनकी जन्मतिथि 21 सितंबर 1931 दर्ज है, जिसके हिसाब से वह दो हफ़्ते पहले 95 के हो चुके थे — यह फ़र्क़ हम यहाँ दर्ज कर रहे हैं, ताकि आपको दोनों आंकड़े दिखें तो उलझन न हो।)
उनके जाने की ख़बर आते ही तेलुगु, तमिल और कन्नड़ फ़िल्म जगत से श्रद्धांजलियों का सिलसिला शुरू हो गया। 4 अक्टूबर की सुबह तक उनका नाम तमिल और तेलुगु, दोनों भाषाओं में Google ट्रेंड्स पर था।
सिंगीतम श्रीनिवास राव — एक नज़र में
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 21 सितंबर 1931, गूडूर (तब मद्रास प्रेसिडेंसी, अब आंध्र प्रदेश) — विकिपीडिया |
| निधन | 3 अक्टूबर 2026, कावेरी अस्पताल, चेन्नई |
| पढ़ाई | प्रेसिडेंसी कॉलेज, चेन्नई से फ़िज़िक्स में डिग्री |
| गुरु | के.वी. रेड्डी (1954–1968 तक सहायक निर्देशक) |
| पहली फ़िल्म (निर्देशक) | ‘नीति निजायिति’ (तेलुगु, 1972) |
| कुल फ़िल्में | क़रीब 60 — तेलुगु, कन्नड़, तमिल, हिंदी और अंग्रेज़ी |
| राष्ट्रीय पुरस्कार | 2 — ‘दिक्कट्र पार्वती’ (तमिल) और ‘पुष्पक विमान’ (कन्नड़) |
| आख़िरी फ़िल्म | ‘सिंग गीतम’ (2026) |
सिंगीतम श्रीनिवास राव कौन थे
सिंगीतम ने फ़िल्मों में आने से पहले विज्ञान पढ़ा था — चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज से फ़िज़िक्स की डिग्री। उसी दौर में वह कवि-नाटककार हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के नाटकों से जुड़े और रंगमंच की बारीकियां सीखीं। विज्ञान और कला का यही मेल आगे चलकर उनकी फ़िल्मों की पहचान बना — टाइम मशीन हो, बिना संवाद की कहानी हो या परदे पर क़द छोटा करने की तरकीब, हर बार वह कोई नया तकनीकी सवाल हल करते दिखे।
1954 से 1968 तक, यानी पूरे चौदह साल, उन्होंने तेलुगु सिनेमा के दिग्गज निर्देशक के.वी. रेड्डी के सहायक के तौर पर काम किया। इसी दौरान वह ‘मायाबाज़ार’ (1957) और ‘जगदेका वीरुनि कथा’ (1961) जैसी क्लासिक फ़िल्मों की टीम में रहे। ‘मायाबाज़ार’ को आज भी दक्षिण भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी फ़ैंटेसी फ़िल्मों में गिना जाता है — और फ़ैंटेसी का वही रंग सिंगीतम की अपनी फ़िल्मों में बार-बार लौटा।
निर्देशक के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म ‘नीति निजायिति’ (1972) आलोचकों को पसंद आई, पर बॉक्स ऑफ़िस पर नहीं चली। दो साल बाद तमिल फ़िल्म ‘दिक्कट्र पार्वती’ (1974) ने उन्हें तमिल की सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया, और यहीं से उनका लंबा सफ़र शुरू हुआ।
‘पुष्पक’ — जिसमें एक भी डायलॉग नहीं था
हिंदी दर्शकों के लिए सिंगीतम श्रीनिवास राव का सबसे बड़ा परिचय ‘पुष्पक’ है। मूल रूप से कन्नड़ में ‘पुष्पक विमान’ नाम से बनी यह फ़िल्म 27 नवंबर 1987 को रिलीज़ हुई और हिंदी में ‘पुष्पक’, तमिल में ‘पेसुम पदम’, तेलुगु में ‘पुष्पक विमानम’ नाम से दिखाई गई। ख़ासियत यह कि पूरी फ़िल्म में किरदार एक भी संवाद नहीं बोलते — कहानी सिर्फ़ चेहरे के भाव, हरकतों, बैकग्राउंड म्यूज़िक और फ़िज़िकल कॉमेडी के सहारे चलती है।
विकिपीडिया के मुताबिक़ यह विचार सिंगीतम को किसी और फ़िल्म में सहायक के तौर पर काम करते हुए आया था — क्या भावनाएँ बिना एक शब्द बोले परदे पर उतारी जा सकती हैं? उन्होंने दो हफ़्ते में स्क्रीनप्ले लिखा और कमल हासन ने पढ़ते ही हाँ कर दी। फ़िल्म में कमल हासन एक बेरोज़गार ग्रेजुएट बने थे, साथ में अमला, समीर खख्खर और टीनू आनंद थे।
‘पुष्पक’ एक “स्लीपर हिट” निकली — बेंगलुरु में यह 35 हफ़्ते तक सिनेमाघरों में चली। इसे लोकप्रिय और स्वस्थ मनोरंजन देने वाली सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, और तीन फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी — सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (कन्नड़)। आज लगभग चार दशक बाद भी इसे भारतीय सिनेमा के सबसे साहसी प्रयोगों में गिना जाता है।
कमल हासन के साथ चार दशक का रिश्ता
सिंगीतम और कमल हासन की जोड़ी भारतीय सिनेमा की सबसे रचनात्मक निर्देशक-अभिनेता जोड़ियों में रही। ‘राजा पार्वई’ (1981), ‘पुष्पक’ (1987), ‘अपूर्व सगोदरर्गल’ (1989) और ‘माइकल मदन काम राजन’ (1990) — चारों में कमल हासन ने अलग-अलग तरह के जोखिम उठाए। कमल हासन के लंबे फ़िल्मी सफ़र पर हमारी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।
‘अप्पू राजा’ — बिना कंप्यूटर के बौने का किरदार
14 अप्रैल 1989 को रिलीज़ हुई ‘अपूर्व सगोदरर्गल’ हिंदी में 1990 में ‘अप्पू राजा’ नाम से डब होकर आई। इसमें कमल हासन ने अप्पू नाम के एक बौने का किरदार निभाया था, और यह कैसे फ़िल्माया गया, यह आज भी चर्चा का विषय है। विकिपीडिया के मुताबिक़ सीधे कोण वाले शॉट्स के लिए कमल हासन के मुड़े हुए घुटनों पर ख़ास जूते बाँधे गए, और साइड से दिखने वाले शॉट्स के लिए ज़मीन में गड्ढा खोदकर उनके पैर छिपाए गए। स्पेशल इफ़ेक्ट्स में बेंगलुरु के एक वैज्ञानिक ने मदद की थी।
यह फ़िल्म उस वक़्त की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली तमिल फ़िल्म बनी, 200 दिन तक चली और बेंगलुरु के पाँच सिनेमाघरों में 100 दिन पूरे करने वाली पहली तमिल फ़िल्म बनी।
‘मुंबई एक्सप्रेस’ — डिजिटल कैमरे पर शूट हुई पहली सेंसर्ड फ़िल्म
2005 में सिंगीतम ने कमल हासन और मनीषा कोइराला के साथ ‘मुंबई एक्सप्रेस’ बनाई, जो हिंदी और तमिल में एक साथ शूट हुई — तमिल संस्करण 14 अप्रैल और हिंदी 15 अप्रैल 2005 को आया। विकिपीडिया इसे डिजिटल फ़ॉर्मेट में शूट हुई पहली सेंसर्ड भारतीय फ़िल्म बताता है। तकनीक के मामले में यह फिर एक पहला क़दम था, पर बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म नहीं चली — ₹4.50 करोड़ के बजट के मुक़ाबले कमाई ₹5.17 करोड़ रही और इसे फ़्लॉप माना गया। कई समीक्षकों ने तब डिजिटल कैमरे के लुक को ही दर्शकों की नापसंदगी की एक वजह बताया था।
‘आदित्य 369’ और ‘मयूरी’ — तेलुगु सिनेमा की दो पहचान
तेलुगु दर्शकों के लिए सिंगीतम का नाम सबसे पहले ‘आदित्य 369’ (1991) से जुड़ता है — यह साइंस-फ़िक्शन कॉमेडी तेलुगु सिनेमा में टाइम ट्रैवल का विचार लेकर आई थी। तेलंगाना टुडे ने अपनी श्रद्धांजलि रिपोर्ट में इसे ख़ास तौर पर उनकी सबसे यादगार फ़िल्मों में गिना।
इससे पहले ‘मयूरी’ (1984) आई थी — यह फ़िल्म रिकॉर्ड 14 नंदी पुरस्कार जीत गई और इसके लिए सिंगीतम को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का नंदी और फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। 1994 की फ़ैंटेसी फ़िल्म ‘भैरव द्वीपम’ के लिए उन्हें फिर से सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का नंदी मिला। 2012 में उन्हें लाइफ़टाइम अचीवमेंट के लिए बी.एन. रेड्डी राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।
एनिमेशन, संगीत और ‘कल्कि 2898 AD’ से रिश्ता
सिंगीतम सिर्फ़ निर्देशक नहीं थे। उन्होंने लिखा, प्रोड्यूस किया, अभिनय किया और संगीत भी दिया — कन्नड़ फ़िल्मों ‘भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा’ (1985) और ‘संयुक्ता’ (1988) का संगीत उन्हीं का था। 2000 के दशक में वह एनिमेशन की ओर मुड़े: ‘सन ऑफ़ अलादीन’ (2003) में 1,100 शॉट्स और 125 किरदार थे, और ‘घटोत्कच’ (2008) को 2014 के बाल फ़िल्म महोत्सव में विशेष उल्लेख मिला।
नई पीढ़ी भी उनसे सीखती रही। विकिपीडिया के मुताबिक़ निर्देशक नाग अश्विन ने प्रभास की ‘कल्कि 2898 AD’ (2024) की स्क्रिप्टिंग और शूटिंग के दौरान सिंगीतम से मार्गदर्शन लिया था।
94 की उम्र में आख़िरी फ़िल्म — ‘सिंग गीतम’
सिंगीतम की कहानी का सबसे असाधारण हिस्सा उसका अंत है। क़रीब दस साल के अंतराल के बाद उन्होंने ‘सिंग गीतम’ से निर्देशन में वापसी की — एक फ़ैंटेसी-कॉमेडी म्यूज़िकल, जिसे वैजयंती मूवीज़ ने बनाया और जिसका संगीत देवी श्री प्रसाद ने दिया। यह फ़िल्म 2026 की गर्मियों में रिलीज़ हुई, यानी उनके निधन से कुछ ही महीने पहले। तेलंगाना टुडे के शब्दों में, 94 की उम्र में फ़िल्म निर्देशित करने के लिए उन्हें फ़िल्म जगत और दर्शकों, दोनों से भरपूर सराहना मिली।
कुछ ही हफ़्ते पहले हमने चेन्नई में 94 की उम्र में दुनिया छोड़ने वाली एक और दिग्गज सौकार जानकी के बारे में लिखा था। दक्षिण भारतीय सिनेमा की वह पीढ़ी, जिसने 1950 के दशक में काम शुरू किया था, अब धीरे-धीरे विदा हो रही है।
सिनेमा जगत ने कैसे याद किया
India TV के मुताबिक़ कई बड़े नामों ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी (अंग्रेज़ी से अनुवाद):
- चिरंजीवी: “एक सच्चे दूरदर्शी। उनकी कल्पना और नए विचारों को आज़माने के साहस ने भारतीय सिनेमा को कुछ सबसे अविस्मरणीय फ़िल्में दीं।”
- एस.एस. राजामौली: “उन्होंने हमारी पूरी पीढ़ी को दिखाया कि सिनेमा में असली सीमा सिर्फ़ कल्पना की होती है।”
- महेश बाबू: उन्हें “भारतीय सिनेमा का दिग्गज” और असाधारण कल्पनाशीलता, साहस और प्रतिभा वाला फ़िल्मकार बताया।
- प्रभुदेवा: उन्होंने लिखा कि वह ख़ुद को भाग्यशाली मानते हैं कि सिंगीतम की फ़िल्म ‘कादला कादला’ का हिस्सा रहे।
- नागार्जुन, जूनियर एनटीआर और विष्णु मांचू ने भी श्रद्धांजलि दी।
सिंगीतम श्रीनिवास राव की प्रमुख फ़िल्में
| साल | फ़िल्म | भाषा | ख़ास बात |
|---|---|---|---|
| 1972 | नीति निजायिति | तेलुगु | निर्देशक के तौर पर पहली फ़िल्म |
| 1974 | दिक्कट्र पार्वती | तमिल | राष्ट्रीय पुरस्कार |
| 1981 | राजा पार्वई | तमिल | कमल हासन के साथ पहली फ़िल्म |
| 1984 | मयूरी | तेलुगु | रिकॉर्ड 14 नंदी पुरस्कार |
| 1987 | पुष्पक विमान / पुष्पक | कन्नड़ (हिंदी में ‘पुष्पक’) | बिना संवाद की फ़िल्म, राष्ट्रीय पुरस्कार |
| 1989 | अपूर्व सगोदरर्गल | तमिल (हिंदी में ‘अप्पू राजा’) | उस वक़्त की सबसे बड़ी तमिल हिट |
| 1990 | माइकल मदन काम राजन | तमिल | कमल हासन के साथ चौथी फ़िल्म |
| 1991 | आदित्य 369 | तेलुगु | तेलुगु की टाइम-ट्रैवल फ़िल्म |
| 1994 | भैरव द्वीपम | तेलुगु | फ़ैंटेसी, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का नंदी |
| 2005 | मुंबई एक्सप्रेस | हिंदी / तमिल | डिजिटल पर शूट हुई पहली सेंसर्ड भारतीय फ़िल्म |
| 2008 | घटोत्कच | एनिमेशन | बाल फ़िल्म महोत्सव में विशेष उल्लेख |
| 2026 | सिंग गीतम | तेलुगु | आख़िरी फ़िल्म, 94 की उम्र में |
उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी और पुरस्कारों की पूरी सूची विकिपीडिया पर देखी जा सकती है। दक्षिण और हिंदी सिनेमा की बाक़ी ख़बरों के लिए हमारा एंटरटेनमेंट सेक्शन देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सिंगीतम श्रीनिवास राव का निधन कब और कहाँ हुआ?
3 अक्टूबर 2026 को चेन्नई के कावेरी अस्पताल में, जहाँ उनका उम्र से जुड़ी बीमारियों का इलाज चल रहा था।
सिंगीतम श्रीनिवास राव की उम्र कितनी थी?
समाचार रिपोर्ट्स में उनकी उम्र 94 साल बताई गई है। विकिपीडिया पर दर्ज जन्मतिथि (21 सितंबर 1931) के हिसाब से वह 95 के हो चुके थे।
‘पुष्पक’ फ़िल्म का निर्देशक कौन था?
सिंगीतम श्रीनिवास राव। 1987 की यह फ़िल्म मूल रूप से कन्नड़ में ‘पुष्पक विमान’ नाम से बनी थी, हिंदी में ‘पुष्पक’ नाम से आई, और इसमें एक भी संवाद नहीं है।
क्या ‘अप्पू राजा’ भी सिंगीतम की फ़िल्म थी?
हाँ। ‘अप्पू राजा’ (1990) उनकी तमिल फ़िल्म ‘अपूर्व सगोदरर्गल’ (1989) का हिंदी डब संस्करण है, जिसमें कमल हासन ने बौने का किरदार निभाया था।
सिंगीतम श्रीनिवास राव की आख़िरी फ़िल्म कौन-सी थी?
‘सिंग गीतम’ (2026), एक फ़ैंटेसी-कॉमेडी म्यूज़िकल, जो इसी साल रिलीज़ हुई। इसे वैजयंती मूवीज़ ने प्रोड्यूस किया था।
सिंगीतम श्रीनिवास राव ने कितनी हिंदी फ़िल्में बनाईं?
सीधे हिंदी में बनी उनकी मुख्य फ़िल्म ‘मुंबई एक्सप्रेस’ (2005) है, जो हिंदी और तमिल में एक साथ शूट हुई थी। ‘पुष्पक’ और ‘अप्पू राजा’ हिंदी दर्शकों तक दूसरी भाषाओं से पहुँचीं।













