भोजपुरी की इकलौती नेशनल अवार्ड विजेता फ़िल्म का हीरो रवि किशन था — 2007 में जूरी ने यह अवार्ड किसी को नहीं दिया

By Riya Mehta

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भोजपुरी की इकलौती नेशनल अवार्ड विजेता फ़िल्म का हीरो रवि किशन था — 2007 में जूरी ने यह अवार्ड किसी को नहीं दिया

सीधा जवाब: भोजपुरी की सिर्फ़ एक फ़िल्म ने ‘सर्वश्रेष्ठ भोजपुरी फ़ीचर फ़िल्म’ का नेशनल फ़िल्म अवार्ड जीता है — ‘कब होई गवना हमार’ (2005), 53वें नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स में।

ख़ास बात: उस फ़िल्म के हीरो रवि किशन थे। और दो साल बाद, 2007 की फ़िल्मों के लिए यह अवार्ड किसी को नहीं दिया गया

भोजपुरी सिनेमा हर साल सैकड़ों फ़िल्में बनाता है, गानों के व्यू करोड़ों में होते हैं, और इसके सितारे सांसद तक बनते हैं। इसके बावजूद एक सवाल बार-बार पूछा जाता है — भोजपुरी फ़िल्म नेशनल अवार्ड: क्या आज तक किसी भोजपुरी फ़िल्म को यह मिला है?

जवाब हां भी है और लगभग ना भी। पूरी तस्वीर देखिए, क्योंकि यही तस्वीर बताती है कि भोजपुरी इंडस्ट्री की असली दिक़्क़त कमाई नहीं, दर्ज होना है।

‘कब होई गवना हमार’ — इकलौती नेशनल अवार्ड फ़िल्म

जानकारीविवरण
फ़िल्मकब होई गवना हमार (Kab Hoi Gawna Hamar)
साल2005
अवार्डBest Feature Film in Bhojpuri (सर्वश्रेष्ठ भोजपुरी फ़ीचर फ़िल्म)
किस एडिशन में53वें नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स
निर्देशकआनंद डी. घाटराज
निर्मातादीपा नारायण
मुख्य कलाकाररवि किशन, रश्मि देसाई, उदित नारायण, दीपाली, माधुरी मिश्रा

कास्ट अपने आप में दिलचस्प है। हीरो रवि किशन थे — वही रवि किशन जो आज गोरखपुर से सांसद हैं और जो ख़ुद भोजपुरी इंडस्ट्री की हालत पर सख़्त बातें कह चुके हैं (उनका पूरा सफ़र यहां पढ़ें)। साथ में रश्मि देसाई थीं, जो बाद में हिंदी टीवी का बड़ा नाम बनीं, और उदित नारायण, जो गायक के तौर पर मशहूर हैं लेकिन इस फ़िल्म में पर्दे पर दिखे।

जूरी ने क्या लिखा था

नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स के साथ हर अवार्ड की एक आधिकारिक टिप्पणी (citation) दर्ज होती है। ‘कब होई गवना हमार’ के लिए जूरी की टिप्पणी थी:

“For a family drama that harks back to traditional values and modern day sensibilities.”

यानी — एक ऐसा पारिवारिक ड्रामा, जो पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक संवेदनाओं, दोनों को साथ लेकर चलता है।

उसी साल किन-किन भाषाओं को यह अवार्ड मिला था?

53वें नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स में ‘सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म’ का भाषा-वार अवार्ड असमिया, बांग्ला, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, ओड़िया, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, अंग्रेज़ी और मोनपा — इन भाषाओं के साथ-साथ भोजपुरी को भी मिला।

यह ध्यान देने लायक़ है कि भोजपुरी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है। यानी इस श्रेणी में जगह पाना अपने आप में एक बड़ी बात थी — और भोजपुरी को वह जगह सिर्फ़ इसी एक बार मिली।

2007 में यह अवार्ड किसी को नहीं दिया गया

अब सबसे बताने लायक़ हिस्सा। 55वें नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स, जो 2007 की फ़िल्मों के लिए थे, उनमें भोजपुरी का नाम विजेताओं में नहीं, बल्कि “अवार्ड नहीं दिए गए” वाली सूची में है

नेशनल अवार्ड्स में यह होता है: अगर जूरी को किसी श्रेणी में कोई फ़िल्म उस स्तर की नहीं लगती, तो वह अवार्ड उस साल दिया ही नहीं जाता। उस साल ग़ैर-आठवीं-अनुसूची भाषाओं में सिर्फ़ अंग्रेज़ी को यह अवार्ड मिला — ऋतुपर्णो घोष की ‘द लास्ट लियर’ को।

यानी भोजपुरी के लिए कहानी सिर्फ़ “एक बार जीता” नहीं है। कहानी यह है कि जीतने के बाद अगली बार जूरी को कोई फ़िल्म इस लायक़ नहीं मिली।

दूसरा नेशनल अवार्ड — और वह फ़ीचर फ़िल्म नहीं थी

भोजपुरी के खाते में एक और नेशनल फ़िल्म अवार्ड है, लेकिन वह अलग श्रेणी का है।

‘उधेड़ बुन’ (Udedh Bun, 2008) को नेशनल फ़िल्म अवार्ड फ़ॉर बेस्ट शॉर्ट फ़िक्शन फ़िल्म मिला। इसी फ़िल्म ने 2008 के बर्लिन इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में बेस्ट शॉर्ट फ़िल्म का सिल्वर बियर भी जीता — विकिपीडिया के मुताबिक़ भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था।

तो कुल जमा हिसाब यह है: दो नेशनल फ़िल्म अवार्ड — एक फ़ीचर फ़िल्म का (2005), एक शॉर्ट फ़िल्म का (2008)। और उसके बाद से यह सूची वहीं की वहीं है।

एक बात जो आंकड़ों से ज़्यादा कुछ कहती है

तेलुगु, कन्नड़, मराठी, बांग्ला — इन सब भाषाओं के लिए विकिपीडिया पर अलग-अलग पन्ने हैं, जिन पर ‘Best Feature Film in …’ के सारे विजेता साल-दर-साल दर्ज हैं। भोजपुरी के लिए ऐसा कोई पन्ना है ही नहीं।

यह छोटी-सी बात नहीं है। इस साइट पर हम पहले भी यह दर्ज कर चुके हैं कि भोजपुरी का बॉक्स ऑफ़िस डेटा किसी ट्रैकर पर नहीं है, और यह कि इंडस्ट्री की पहली फ़िल्म की रिलीज़ डेट तक पर स्रोत आपस में नहीं मिलते। अवार्ड का रिकॉर्ड भी उसी ढर्रे पर है — इंडस्ट्री बड़ी है, दस्तावेज़ छोटे हैं।

तो भोजपुरी के अपने अवार्ड कौन से हैं?

नेशनल अवार्ड्स में जगह भले न मिली हो, भोजपुरी इंडस्ट्री के अपने समारोह ज़रूर हैं।

अवार्डकब सेकिसने शुरू कियाकहां होता है
भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड्स (BFA)2005AB5 मल्टीमीडिया और वेव मल्टीमीडियाभारत में
इंटरनेशनल भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड (IBFA)2015यशी फ़िल्म्स इंटरनेशनलहर साल किसी दूसरे देश में

भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड्स की शुरुआत 2005 में हुई — यानी उसी साल, जिस साल ‘कब होई गवना हमार’ को नेशनल अवार्ड मिला। पहले ही समारोह में नगमा, रवि किशन और अशोक सराफ़ को सम्मानित किया गया था। बाद के सालों में दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’, पवन सिंह और आम्रपाली दुबे जैसे नाम इसमें शामिल होते रहे।

IBFA की ख़ासियत यह है कि यह हर साल किसी दूसरे देश में होता है — पहला समारोह 2015 में मॉरीशस में हुआ, फिर 2016 में दुबई, 2017 में लंदन, 2018 में मलेशिया और 2019 में सिंगापुर। 2023 का समारोह दुबई के कोका-कोला एरीना में हुआ।

कुछ दर्ज विजेता:

  • IBFA 2017 (लंदन): बेस्ट एक्ट्रेस — मधु शर्मा; बेस्ट फ़िल्म — ‘आशिक़ आवारा’; स्टार ऑफ़ द मिलेनियम — मनोज तिवारी; बेस्ट एक्टर (क्रिटिक्स) — रवि किशन; बेस्ट मेल सिंगर — पवन सिंह; बेस्ट एक्ट्रेस (व्यूअर्स चॉइस) — अंजना सिंह।
  • IBFA 2018 (मलेशिया): बेस्ट एक्टर — दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’, ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 2’ के लिए।
  • IBFA 2023 (दुबई): बेस्ट डेब्यूटेंट एक्ट्रेस — हर्षिका पुनाचा, ‘हम हैं राही प्यार के’ के लिए।

लेकिन यहां भी वही दिक़्क़त है। भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड्स का विकिपीडिया पन्ना अक्टूबर 2017 से “अपडेट की ज़रूरत है” का टैग लगाए बैठा है, और 2011 से 2022 तक के कई समारोहों के विजेताओं की जानकारी अधूरी या ग़ायब है। 2024 के 19वें समारोह के विजेता भी दर्ज नहीं हैं।

इंडस्ट्री छोटी नहीं है — फिर पहचान क्यों नहीं?

विकिपीडिया के भोजपुरी सिनेमा पन्ने पर दर्ज आंकड़े इस विरोधाभास को साफ़ दिखाते हैं:

  • 1962–67 के बीच सिर्फ़ 19 फ़िल्में बनीं, फिर 1967–76 में सिर्फ़ 2
  • 1977 से 2001 तक क़रीब 150 फ़िल्में — यानी औसतन 6 फ़िल्में साल की।
  • 2001 में ‘सैयां हमार’ से इंडस्ट्री दोबारा खड़ी हुई।
  • 2022 तक सालाना उत्पादन 186 फ़िल्मों तक पहुंच गया।
  • इंडस्ट्री का मौजूदा अनुमान क़रीब ₹2,000 करोड़ बताया जाता है।

साथ ही यह भी दर्ज है कि 2000 के दशक की शुरुआत से इंडस्ट्री पर दोहरे अर्थ वाले संवादों, अश्लील बोल और उत्तेजक डांस सीक्वेंस को लेकर लगातार आलोचना होती रही है।

यही दोनों बातें एक साथ रखिए — 186 फ़िल्में सालाना, और 2005 के बाद एक भी फ़ीचर फ़िल्म नेशनल अवार्ड नहीं — तो तस्वीर अपने आप बन जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या किसी भोजपुरी फ़िल्म को नेशनल अवार्ड मिला है?

हां। ‘कब होई गवना हमार’ (2005) को 53वें नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स में ‘सर्वश्रेष्ठ भोजपुरी फ़ीचर फ़िल्म’ का अवार्ड मिला था। इसके अलावा ‘उधेड़ बुन’ (2008) को बेस्ट शॉर्ट फ़िक्शन फ़िल्म का नेशनल अवार्ड मिला।

‘कब होई गवना हमार’ में हीरो कौन थे?

रवि किशन। फ़िल्म में रश्मि देसाई, उदित नारायण, दीपाली और माधुरी मिश्रा भी थे। निर्देशन आनंद डी. घाटराज का था और निर्माता दीपा नारायण थीं।

क्या हर साल भोजपुरी फ़िल्म को नेशनल अवार्ड मिलता है?

नहीं। 2007 की फ़िल्मों के लिए हुए 55वें नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स में भोजपुरी का यह अवार्ड किसी को नहीं दिया गया — जूरी को कोई फ़िल्म इस लायक़ नहीं मिली।

भोजपुरी फ़िल्मों के अपने अवार्ड कौन से हैं?

मुख्य रूप से दो — भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड्स (2005 से) और इंटरनेशनल भोजपुरी फ़िल्म अवार्ड यानी IBFA (2015 से), जो हर साल किसी दूसरे देश में होता है।

IBFA कहां-कहां हो चुका है?

मॉरीशस (2015), दुबई (2016), लंदन (2017), मलेशिया (2018), सिंगापुर (2019) और फिर 2023 में दुबई।

भोजपुरी में हर साल कितनी फ़िल्में बनती हैं?

विकिपीडिया के मुताबिक़ 2022 में 186 फ़ीचर फ़िल्में बनीं। इससे पहले 1977 से 2001 के बीच पूरे 24 साल में सिर्फ़ 150 के क़रीब फ़िल्में बनी थीं।


यह भी पढ़ें: 72वें नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स 2026 — पूरी विजेता सूची · मनोज तिवारी कौन हैं — गायक से सांसद तक · भोजपुरी की और ख़बरें

स्रोत: Wikipedia — 53rd National Film Awards, 55th National Film Awards, Bhojpuri cinema, Bhojpuri Film Awards

Riya Mehta covers Hindi entertainment news at Sabhi Saman, with a focus on Bollywood, Bhojpuri cinema, and OTT releases. She tracks trending celebrity stories and verifies them against credible sources before writing.

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