सीधा जवाब: 2001 में शबाना आज़मी ने ‘गदर: एक प्रेम कथा’ को “भड़काऊ” बताते हुए कहा था कि फ़िल्म मुसलमानों को “दूसरे” की तरह पेश करती है। सनी देओल इस पर नाराज़ हुए थे और उनका कहना था कि दुख इसलिए हुआ क्योंकि “वो तो पढ़ी लिखी हैं।” क़रीब 25 साल बाद दोनों राजकुमार संतोषी की ‘बंटवारा 1947’ में — एक बार फिर बँटवारे पर बनी फ़िल्म में — साथ नज़र आ रहे हैं।
हिंदी सिनेमा में कुछ टकराव फ़िल्म के साथ ही ख़त्म हो जाते हैं, और कुछ इंडस्ट्री की याददाश्त में जम जाते हैं। सनी देओल और शबाना आज़मी के बीच ‘गदर’ को लेकर हुई बहस दूसरी क़िस्म की थी। और अब, ढाई दशक बाद, दोनों उसी विषय — भारत-पाकिस्तान बँटवारे — पर बनी एक फ़िल्म में आमने-सामने नहीं, बल्कि एक ही फ़्रेम में हैं।
2001 में शबाना ने कहा क्या था
‘गदर: एक प्रेम कथा’ 2001 की सबसे बड़ी कमाई करने वाली फ़िल्मों में थी। तारा सिंह और सकीना की कहानी ने सिनेमाघरों में जो माहौल बनाया, उस पर शबाना आज़मी का नज़रिया अलग था।
शबाना ने फ़िल्म को भड़काऊ बताया और कहा कि यह मुसलमानों को “दूसरे” यानी अलग और विरोधी पक्ष की तरह दिखाती है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के हवाले से उनका तर्क यह भी था कि फ़िल्म राष्ट्रवाद, धर्म और पहचान — तीनों को एक साथ मिला देती है, लेकिन बँटवारे की तकलीफ़ की असल पेचीदगी को पर्दे पर नहीं लाती।
सनी देओल का पलटवार
सनी देओल के लिए यह आलोचना सिर्फ़ एक रिव्यू नहीं थी। उनका कहना था कि उन्हें दुख इसलिए हुआ क्योंकि शबाना समझदार और पढ़ी-लिखी हैं — “वो तो पढ़ी लिखी हैं।”
सनी ने यह भी कहा कि फ़िल्म की कामयाबी ही उसका जवाब है — दर्शकों को उसमें कुछ आपत्तिजनक नहीं लगा। उनके मुताबिक़ फ़िल्म किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए बनाई ही नहीं गई थी, और उसके दोनों मुख्य किरदार मासूम और सच्चे थे। जो लोग फ़िल्म को साम्प्रदायिक कह रहे थे, उनके बारे में सनी का कहना था कि दिक़्क़त उनकी अपनी सोच में है।
25 साल बाद: वही विषय, अलग कहानी
अब कहानी पलट गई है। राजकुमार संतोषी की ‘बंटवारा 1947’ में सनी देओल और शबाना आज़मी पहली बार बड़े पर्दे पर साथ हैं। फ़िल्म असग़र वजाहत के मशहूर नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्याई नई’ (1989) से प्रेरित है।
इसमें सनी देओल सिकंदर के किरदार में हैं — एक मुसलमान शरणार्थी, जो बँटवारे के बाद पीछे छूट गई एक बुज़ुर्ग हिंदू महिला की हिफ़ाज़त करता है। वह बुज़ुर्ग महिला शबाना आज़मी हैं। यानी जिस फ़िल्म पर 25 साल पहले “मुसलमानों को दूसरा दिखाने” का इल्ज़ाम लगा था, उसी अभिनेता की नई फ़िल्म का केंद्र एक मुसलमान किरदार की इंसानियत है।
| फ़िल्म | बंटवारा 1947 |
| निर्देशक | राजकुमार संतोषी |
| आधार | असग़र वजाहत का नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्याई नई’ (1989) |
| सनी का किरदार | सिकंदर — मुसलमान शरणार्थी |
| शबाना का किरदार | पीछे छूट गई बुज़ुर्ग हिंदू महिला |
| रिलीज़ | 14 अगस्त 2026 |
बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म कहाँ है
‘बंटवारा 1947’ 14 अगस्त को सिनेमाघरों में आई थी (ट्रेलर रिलीज़ की रिपोर्ट यहाँ), जिसमें प्रीति ज़िंटा भी हैं। रिलीज़ के दो दिन में फ़िल्म ने क़रीब ₹19 करोड़ जुटाए थे, जबकि उसी दिन आई इमरान हाशमी की ‘आवारापन 2’ ने ₹57 करोड़ कर लिए थे — दोनों का पूरा तुलनात्मक आँकड़ा यहाँ।
यानी नंबरों की लड़ाई में सनी देओल की फ़िल्म पीछे रही, लेकिन जिस चीज़ की सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है वो कलेक्शन नहीं — शबाना आज़मी और सनी देओल की ऑनस्क्रीन जोड़ी है। सनी इस साल वैसे भी लगातार चर्चा में रहे हैं, चाहे वो 26 साल में पहली बार KBC की हॉट सीट पर बैठना हो या 15 अगस्त की रिलीज़ लिस्ट में जगह बनाना।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शबाना आज़मी ने ‘गदर’ के बारे में क्या कहा था?
उन्होंने फ़िल्म को भड़काऊ बताया था और कहा था कि यह मुसलमानों को “दूसरे” की तरह पेश करती है।
सनी देओल ने क्या जवाब दिया था?
सनी ने कहा था कि दुख इसलिए हुआ क्योंकि “वो तो पढ़ी लिखी हैं”, और फ़िल्म की कामयाबी ही आलोचना का जवाब है।
‘बंटवारा 1947’ किस पर आधारित है?
असग़र वजाहत के 1989 के नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्याई नई’ से प्रेरित है। निर्देशक राजकुमार संतोषी हैं।
फ़िल्म में सनी देओल का किरदार क्या है?
वो सिकंदर नाम के एक मुसलमान शरणार्थी की भूमिका में हैं, जो बँटवारे के बाद पीछे छूट गई एक बुज़ुर्ग हिंदू महिला की हिफ़ाज़त करता है।
क्या सनी देओल और शबाना आज़मी ने पहले साथ काम किया है?
बड़े पर्दे पर यह उनकी पहली साथ की फ़िल्म बताई जा रही है।
स्रोत: आज तक












